
प्रशासन की अनदेखी पर उठे सवाल
उत्तराखंड राज्य गठन के ढाई दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र का प्रमुख ‘रामलीला मैदान’ (आजाद मैदान) अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। कभी शहर की धड़कन कहे जाने वाले इस ऐतिहासिक मैदान की वर्तमान स्थिति को लेकर स्थानीय जनता में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।

👇सांस्कृतिक पहचान से कीचड़ के साम्राज्य तक👇
स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह मैदान कभी उत्तरकाशी की पहचान और शान हुआ करता था। यहाँ प्रसिद्ध बाड़ाहाट का थौलौ मेला, रामलीला, फुटबॉल-क्रिकेट प्रतियोगिताएँ, गणतंत्र दिवस परेड और अन्य सार्वजनिक आयोजन हुआ करते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि खेलकूद और युवाओं के लिए एक इंच खाली जमीन नहीं बची है।
अवैध अतिक्रमण और अव्यवस्था का केंद्र

👇मैदान की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है:👇
👉अवैध बाजार मैदान को ठेली-रेहड़ी, सब्जी, फल और गन्ने के जूस की मंडी में तब्दील कर दिया गया है।

👉 वाहनों की वर्कशॉप: यात्राकाल के दौरान पार्किंग के नाम पर खोली गई इस जगह पर ट्रकों और भारी वाहनों की मरम्मत की वर्कशॉप चल रही हैं।

👉गंदगी और कीचड़: मैदान के चारों ओर जलभराव और भारी कीचड़ फैला हुआ है, जिससे यह खेल का मैदान कम और दलदल अधिक नजर आता है।

👉अस्थायी बस्तियाँ: यहाँ बंजारों के तंबू और अस्थायी ठिकाने बस चुके हैं।
जिम्मेदारी किसकी?
जनता का सीधा सवाल जिला प्रशासन, नगर पालिका और जिला पंचायत से है कि आखिर इस मैदान का नैतिक मालिक कौन है? मेले और आयोजनों से राजस्व जुटाने वाले विभाग मैदान के रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। करोड़ों रुपये के बजट और रखरखाव के दावों के बावजूद मैदान की हालत दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है।
स्थानीय युवाओं (Gen Z) के पास खेलने के लिए जिले में एक ढंग का मैदान तक उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण युवाओं और आम नागरिकों ने प्रशासन से तत्काल संज्ञान लेकर मैदान को पुनर्जीवित और अतिक्रमण मुक्त करने की मांग की है।

Leave a Reply