उत्तरकाशी: सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों पारंपरिक ‘थोलू’ (स्थानीय मेलों) का उल्लास चरम पर है। जनपद के विभिन्न गांवों में आयोजित हो रहे इन पारंपरिक मेलों में लोक संस्कृति, आस्था और आपसी भाईचारे का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की गूंज के बीच ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर देव डोलियों के दर्शन और मेलों के आनंद के लिए उमड़ रहे हैं।


      👇🏾देव डोलियों के आगमन से भक्तिमय हुआ माहौल👇🏾
गांवों में आयोजित थोलू के अवसर पर स्थानीय आराध्य देवी-देवताओं के पश्वा अवतरित हुए और भव्य देव डोलियों ने ग्रामीणों को आशीर्वाद दिया। देव निशानों और डोलियों के प्रांगण में पहुंचते ही पूरा वातावरण “जय जयकार” के नारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पारंपरिक भेंट, अक्षत और पुष्प अर्पित कर क्षेत्र की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
        

👇🏾रासों और तांदी नृत्य का आकर्षण👇🏾


थोलू का मुख्य आकर्षण पारंपरिक लोकनृत्य रहे। पुरुषों और महिलाओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर गोल घेरे में पारंपरिक ‘रासों’ और ‘तांदी’ नृत्यों की प्रस्तुति दी। ढोल-दमाऊ की थाप पर देर शाम तक लोकगीतों और नृत्यों का दौर चलता रहा, जिसमें बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।


         👇🏾बाजारों में रौनक, दूर-दराज से पहुंचे प्रवासी👇🏾
मेलों के चलते गांव के चौपालों और खुले मैदानों में सजी दुकानों पर भी खासी भीड़ रही। बच्चों ने खिलौनों और झूलों का आनंद लिया, वहीं महिलाओं ने घरेलू सामान और पारंपरिक मिठाइयों की खरीदारी की।

विशेष बात यह रही कि थोलू के पावन अवसर पर रोजगार और शिक्षा के सिलसिले में बाहर रह रहे प्रवासी ग्रामीण भी अपने पैतृक गांव पहुंचे, जिससे गांवों में उत्सव का माहौल दोगुना हो गया।
ग्रामीणों का कहना है कि सदियों पुराने ये थोलू मेले केवल उत्सव का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह हमारी समृद्ध पहाड़ी विरासत, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने को जीवित रखने का सबसे सशक्त आधार हैं।

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