आस्था के सैलाब के साथ वार्षिक वारुणी यात्रा का आगाज, श्रद्धालुओं ने लगाई पुण्य की डुबकी

जनपद की ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व वाली वार्षिक ‘वारुणी यात्रा’ रविवार को चैत्र मास की त्रयोदशी तिथि पर श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ शुरू हुई। वरुणावत पर्वत की पंचकोसी परिक्रमा पर आधारित इस 15 किलोमीटर लंबी यात्रा में जनपद सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया।
👇 संगम स्नान से हुई यात्रा की शुरुआत


यात्रा का शुभारंभ बड़ेथी क्षेत्र से हुआ, जहाँ श्रद्धालुओं ने सबसे पहले वरुणा और गंगा (भागीरथी) के पवित्र संगम पर डुबकी लगाई। इसके बाद ‘जय भोले’ और ‘जय वरुणावत’ के जयघोष के साथ श्रद्धालु बसुंगा, साल्ड, ज्ञाणजा, शिखरेश्वर, संग्राली और पाटा की ओर बढ़े। परिक्रमा मार्ग पर जगह-जगह श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था।
👇 इन प्रमुख मंदिरों में टेका माथा


परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं ने वरुणावत पर्वत पर स्थित विभिन्न पौराणिक मंदिरों में पूजा-अर्चना की। भक्तों ने वरुणेश्वर, अखंडेश्वर, जगतनाथ मंदिर, अष्टभुजा दुर्गा, ज्ञानेश्वर, व्यास कुंड, वरुणावत शिखर पर स्थित शिखरेश्वर, विमलेश्वर महादेव, संग्राली के कंडार देवता तथा पाटा के नर्वदेश्वर मंदिर में दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
👇 काशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक के साथ संपन्न


यात्रा का समापन गंगोरी पहुँचकर हुआ, जहाँ असीगंगा और भागीरथी के संगम में स्नान करने के उपरांत श्रद्धालुओं ने उत्तरकाशी स्थित प्रतिष्ठित भगवान विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक किया। धार्मिक मान्यता है कि इस कठिन परिक्रमा को पूर्ण करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
👇 प्राचीन परंपरा का बदला स्वरुप


जानकारों के अनुसार, प्राचीन काल में यह यात्रा बेहद कठिन थी और तीन दिनों तक चलती थी, जिसमें मुख्य रूप से साधु-संत ही भाग लेते थे। वर्तमान में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए इसे सरल बनाकर एक दिन में संपन्न किया जाता है, जिससे अब महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों सहित आम जनता की भागीदारी काफी बढ़ गई है।

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