
उत्तरकाशी विवेक सिंह सजवाण
नववर्ष से शुरू अनूठा उत्सव
बौद्ध नववर्ष पर भोटिया जनजाति का लोसर मेला:
नववर्ष से शुरू अनूठा उत्सव
उत्तरकाशी, डुडा: महाशिवरात्रि के एक दिन बाद नववर्ष के साथ उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के डुडा तहसील स्थित बगोरी-वीरपुर के भोटिया समुदाय ने लोसर मेले का आयोजन हर्षोल्लास से किया। शीतकाल के अंत में बसंत का स्वागत करने वाला यह पर्व बौद्ध नववर्ष का प्रतीक है।

प्राचीन परंपरा का जीवंत स्वरूप👇
भारत में भाषा-प्रांत अनुसार पर्व अनूठे ढंग से मनाए जाते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए लोसर विशेष महत्व रखता है। तिब्बत सहित सीमांत क्षेत्रों में प्रचलित इसकी परंपरा का सटीक इतिहास भले अज्ञात हो, लेकिन नाम से ही उल्लास छा जाता है।
सरसों के पीले फूलों से सजी प्रकृति के बीच हफ्ते भर चलने वाले मेले में ग्रामीण दैनिक कार्य त्याग एक-दूसरे को बधाइयां देते नजर आते हैं।
पहले दिन की रोमांचक रस्म👇
मेले की प्रमुख विशेषता चीनी नववर्ष के साथ शुरू होना है। प्रथम रात्रि को दीपावली जैसा पर्व मनाया जाता है। जंगलों से चीड़ की तेल वाली ‘दलि’ लकड़ी से मशालें बनाकर ढोल की थाप पर नाचते-गाते लोग गांव के बीच से इकट्ठा हो अंतिम छोर पर पहुंचते हैं। वहां मशालों से प्रज्वलित विशाल अग्नि की परिक्रमा कर घर लौटते हैं।

इस दौरान पत्थर के छोटे टुकड़े ‘तिरिंगता मिरिंगमी’ कहकर बांटे जाते है
ये शुभता के प्रतीक हैं।लोसर मेल भोटिया जनजाति की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह उत्सव प्रकृति और समुदाय के बंधन को मजबूत करता है

