
उत्तरकाशी// विवेक सिंह सजवाण
पवित्र हिमालय की छांव में बसे सीमान्त ग्राम कटखेत (टिहरी गढ़वाल) की यह भूमि न केवल प्रकृति की गोद में बसी है, बल्कि देवताओं की दिव्य उपस्थिति से आलोकित भी है। इसी पावन भूमि पर विराजमान हैं कंडक देवता जो ग्राम के आराध्य, रक्षक और संस्कृति के संवाहक हैं।
कंडक देवता, केवल एक पूज्य देव नहीं, बल्कि संवेदनाओं, परंपराओं और सामूहिक चेतना के केंद्र हैं। पीढ़ियों से ग्रामवासियों ने उन्हें संकट के समय मार्गदर्शक, बीमारियों में वैद्य और न्याय के प्रतीक रूप में अनुभव किया है। साथ ही फसलों की लहलहाहट, बच्चों की हँसी, और पर्वों की समृद्धि में उनका आशीष ही प्रत्यक्ष होता है।
आज इसी आस्था और परंपरा के प्रतीक कंडक देवता को, ग्राम कटखेत की ध्याणियों द्वारा ३ तोला सोने की मूर्ति और ४ किलो चांदी का ढोल अर्पित किया गया है। यह केवल धातु का दान नहीं, बल्कि आत्मा का समर्पण है। यह त्याग और श्रद्धा की वह मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को परंपरा से जोड़ती रहेगी।
यह मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का उत्सव है। जहाँ देवता और ग्रामवासी एक आत्मिक बंधन में बंधे हैं। यह वह क्षण है जब नारीशक्ति, परंपरा और लोकविश्वास मिलकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आह्वान कर रहे हैं।

कंडकेश्वर महाराज संस्कृति के उदगम हैं, जिनके आशीर्वाद से परंपराएँ समृद्ध और सुरक्षित हैं। ध्याणियां क्षेत्र की बेटियां समाज का सम्मान और गौरव हैं। उनकी भक्ति, आस्था, और महाराज के प्रति समर्पण ने जहाँ उत्तरकाशी और टिहरी जनपद में नई ऊर्जा और आस्था से संजोये हुए रखा है।
यह मेला सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव है,और साथ ही समाज की एकता, विश्वास और सामूहिक आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक भी है
